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Showing posts from January, 2026

70 किलोमीटर दूर - आगे

70 किलोमीटर दूर बर्फ़ से ढकी उस दुनिया में सब कुछ तय था। कब चलना है, कहाँ रुकना है, किसके साथ रहना है— पेंग्विनों का समूह हर दिन उसी लय में आगे बढ़ता था। उसी लय में वह भी चलता रहा, बहुत समय तक। उसके पास सब कुछ था— साथ, सुरक्षा, परिचित आवाज़ें। फिर भी उसके भीतर एक सवाल था जो किसी के कंधे से सटकर भी शांत नहीं होता था। एक सुबह, जब हवा असामान्य रूप से शांत थी, वह बिना शोर किए समूह से अलग हो गया। न कोई विदाई, न कोई घोषणा। चलते-चलते ठंड तेज़ होती गई, रास्ता खाली होता गया। कई बार उसे लगा कि वह गलत कर रहा है, कि वापस मुड़ जाना चाहिए। करीब सत्तर किलोमीटर दूर पहुँचकर वह रुक गया। थका हुआ, पर जागा हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा। दूर—बहुत दूर— उसकी दुनिया थी। वही शोर, वही अपनापन, वही लोग जो कभी उसका पूरा आकाश थे। उसकी आँखों में प्रेम था। दुख नहीं। उसे समझ आया कि वह भागा नहीं था। वह खुद को सुनने निकला था। अकेलापन वहाँ था— ठंड की तरह, कभी सहन करने लायक, कभी असहनीय। पर उसी अकेलेपन में उसने अपनी आवाज़ पहचानी। वह जानता था कि रास्ता वापस भी जाता है। और आगे भी। वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा। हवा चलती रही, बर्फ़ गि...

तुम अकेले नही हो

मेरी कहानी का एक हिस्सा तुम हो। और उस हिस्से में ये सच भी शामिल है कि तुम ठीक नहीं हो। मैंने तुम्हें कभी टूटा हुआ नहीं देखा, मैंने बस तुम्ह हर रोज़ खुद को संभालते हुए देखा है। वो संभालना जो बाहर से ताक़त लगता है और अंदर से थकान। मुझे पता है तुमने अकेलापन चुना है। क्योंकि हर किसी को समझाते-समझाते एक दिन इंसान खामोशी चुन लेता है। ऐसी खामोशी जहाँ कम से कम कोई उम्मीद तो नहीं तोड़ता। पर मैं ये भी जानती हूँ कि अकेले रहना और अकेला होना दो अलग-अलग बातें हैं। और मैं तुम्हें अकेला नहीं होने दूँगी। भले ही मैं तुम्हारी प्रेमिका न बनूँ, पर एक अच्छी दोस्त बनकर हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी। ऐसी दोस्त जो तुम्हारे बुरे दिनों से डरकर पीछे नहीं हटेगी। जो तुम्हारी चुप्पी को तुमसे ज़्यादा समझेगी। मुझे तुम्हें बदलने की कोई जल्दी नहीं है। मुझे तुम्हें ठीक करने का कोई घमंड नहीं है। मुझे बस तुम्हारे साथ चलना आता है। और सुनो— ओये, सुनो ज़रा। तुम कितनी भी कोशिश कर लो, मैं तुम्हें छोड़कर जाने वाली नहीं हूँ। क्योंकि साथ छोड़ना मेरी फ़ितरत में नहीं है। ये मेरा वादा है तुमसे— मैं हमेशा साथ रहूँगी। तुम जैसे हो, वैसे ही।...

सफर

 जब मन ने रुकना सीख लिया आजकल ज़िंदगी में एक अजीब-सी शांति है। न किसी बात की जल्दी, न देर हो जाने का डर। सब कुछ जैसे अपनी ही रफ़्तार से चल रहा है—और मैं भी। पहले हर दिन के साथ कई सवाल जुड़े होते थे। आगे क्या होगा, क्या सही होगा, क्या गलत। अब सवाल तो हैं, पर उनसे लड़ने की ताक़त नहीं है। बस उन्हें अपने साथ चलने दे रही हूँ। मैं ये भी ठीक से नहीं समझ पा रही हूँ कि मेरी परेशानी क्या है। दुख है, पर रोने जैसा नहीं। सुकून है, पर पूरी तरह चैन भी नहीं। सब कुछ बीच में अटका हुआ-सा लगता है। कभी-कभी लगता है कि ये ठहराव हार नहीं है, शायद ये वो पल है जहाँ इंसान खुद को बचाने के लिए थोड़ा रुक जाता है। अब मैं ज़्यादा कुछ तय नहीं कर रही। न आज के लिए, न आने वाले कल के लिए। जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करने की कोशिश कर रही हूँ। हर चीज़ पर नियंत्रण रखना भी ज़रूरी नहीं होता। शायद ये Chapter किसी अंत की कहानी नहीं है। शायद ये शुरुआत है— खुद को फिर से समझने की, धीरे-धीरे जीने की, और बिना जल्दबाज़ी के आगे बढ़ने की। कुछ  छूट गया, कुछ बच गया ठहराव के बीच अब बीते हुए कल ज़्यादा साफ़ दिखने लगे हैं। वो लो...

जब सवाल जवाब नहीं माँगते, बस दर्द बन जाते हैं

आजकल मैं खुद को समझ नहीं पा रही हूँ। समझ नहीं आता कि आगे क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ। एक सवाल है जो चुपचाप मेरे मन में घर कर गया है— आख़िर मैं ही क्यों? तुम्हें सब पता था। मेरा टूटना, परिवार की परेशानियाँ, पिछली मोहब्बत का अंजाम, और मेरे मन के अंदर चल रहे अनगिनत द्वंद्व। फिर भी तुम मेरी ज़िंदगी की एक और लड़ाई क्यों बन गए? तुम मुझे समझा सकते थे। प्यार नहीं करना था, तो वो भी कह सकते थे। लेकिन तुमने तो मुझे बिल्कुल अकेला छोड़ दिया— बिना किसी सहारे के। आज मेरे पास कोई नहीं है जिससे मैं अपने जज़्बात बाँट सकूँ। और इसका असर हर चीज़ पर पड़ रहा है— मेरी पढ़ाई पर, मेरे मन पर, मेरे होने पर। मैं पढ़ नहीं पा रही हूँ। मन भटकता रहता है। तुमने बहुत ग़लत समय पर साथ छोड़ा, यार। मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर पा रही। शायद इसलिए नहीं कि मैं बुरी हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा टूट चुकी हूँ। मेरे मन में बहुत कुछ है, पर शब्द साथ नहीं देते। तुम शायद मुझसे दूर रहकर खुश हो, पर मैं खुश नहीं हूँ। सच कहूँ तो मैं ठीक नहीं हूँ। मैं कभी कुछ ग़लत नहीं करूँगी— लेकिन अकेले जीने का मन भी नहीं करता। मैं तुमसे मिलने स...

अनायास जीना..

आजकल मेरी ज़िंदगी में बस एक ही कॉल आता है— मम्मा का। शायद इसलिए क्योंकि उनसे 150 किलोमीटर दूर रहती हूँ। अब अगर कोई मुझसे पूछे कि लाइफ़ कैसी चल रही है, तो सच में जवाब नहीं मिलता। अच्छी है या बुरी— इस फर्क को महसूस करना ही जैसे छूट गया है। पहले फोन बजता था। किसी से बात करना अच्छा लगता था। किसी की आवाज़ दिन को हल्का कर देती थी, किसी का हाल पूछना अपना सा लगता था। अब थोड़ी बोरियत है, पर उसके साथ एक अजीब-सा सुकून भी है। खुद के साथ रहना सीख रही हूँ। शायद यही वो चीज़ है जो मुझे पहले कभी नहीं आई। कभी-कभी लगता है कि मैं इमोशनलेस हो गई हूँ। ना ज़्यादा खुशी, ना ज़्यादा दुख। बस एक ठहराव-सा है। सुबह उठती हूँ, चाय पीती हूँ, पढ़ती हूँ, माँ को अपना हाल बता देती हूँ। फिर खाना, थोड़ा काम— ताकि थोड़ा पैसा कमा सकूँ। शाम को फिर वही क्रम, और रात को नींद। दिन बीतते जाते हैं, एक जैसे… बिना किसी शिकायत के। अब मैं खुद को लोगों के सामने ज़्यादा एक्सप्रेस नहीं करती। डर लगता है। किसी से लगाव हो जाने का डर, और उससे भी ज़्यादा किसी को खो देने के दर्द का। शायद इसलिए अब न किसी से दोस्ती हो पा रही है, न किसी से प्यार। म...

जाओ तुम..

कुछ रिश्ते हमारे जीवन में इसलिए नहीं आते कि वे हमेशा के लिए ठहर जाएँ, बल्कि इसलिए आते हैं कि हमें भीतर से बदल दें। आज मैं उसी समझ के साथ लिख रही हूँ। एक समय था जब तुमसे मिलने की चाह थी, तुम्हें देखने की उत्सुकता थी। लेकिन अब उस मोह को मैंने स्वयं से विदा कर दिया है। अब न कोई आग्रह शेष है, न कोई ज़िद। जो बचा है, वह है शांति— और हालात को जैसे हैं वैसे स्वीकार करने की क्षमता। प्रेम की बात करूँ तो, प्रेम कभी किसी चाह पर निर्भर नहीं होता। वह किसी उपस्थिति का मोहताज नहीं होता। वह तो एक भाव है, जो भीतर जन्म लेता है और वहीं ठहर जाता है। वही भाव अब भी मेरे भीतर है— शांत, स्थिर और मौन। आज मेरी एकमात्र प्रार्थना यही है कि ईश्वर तुम्हें सुरक्षित रखे। तुम जहाँ भी रहो, जैसे भी रहो, जीवन तुम्हें सुकून दे— और तुम भीतर से खुश रहो। कहीं न कहीं, मेरे भीतर से कुछ हट गया है। अब न तुम्हारे साथ होने का मोह बचा है, न इस रिश्ते को सही या सच साबित करने की कोई आवश्यकता। तुम न पूरी तरह सही थे, न पूरी तरह ग़लत— तुम बस एक अनुभव थे, एक क्षण जो आया… और समय के साथ चला गया। अब शब्द उतनी तीव्रता से याद नहीं रहते, साथ का...

आखरी उम्मीद से ब्लॉक लिस्ट तक -

"कुछ कहानियाँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि हमें खुद से मिलाने के लिए लिखी जाती हैं। यह कहानी भी ऐसी ही है—जो शुरू हुई थी एक अनजान नोटिफिकेशन से, पर खत्म हुई एक गहरे आत्म-बोध पर। अक्सर हम दूसरों की 'आखिरी उम्मीद' बनने की कोशिश में खुद को कहीं खो देते हैं। हम सपनों के घर की रसोई तो सजा लेते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि जिस नींव पर वह घर खड़ा है, वह हमारे हाथ में नहीं, किसी और के वादों पर टिकी है। इस किताब के पन्नों में प्यार की मासूमियत भी है, डिजिटल दुनिया की तल्खियाँ भी हैं, और एक टूटते हुए सपने की आवाज़ भी। यह उन सभी के लिए है जिन्होंने कभी किसी अजनबी में अपनी पूरी दुनिया देख ली थी और फिर एक दिन खुद को ब्लॉक लिस्ट के सन्नाटे में पाया। यह मेरी अधूरी कहानी है, जो शायद अब अपनी पूर्णता की तलाश में नहीं, बल्कि अपनी शांति की तलाश में है।"                           - एक अनचाहा नोटिफिकेशन - फेसबुक की दुनिया भी कितनी अजीब है, हज़ारों चेहरों की भीड़ में कब कौन सा नाम आपकी ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन जाए, कोई नहीं जानता। मेरे लिए ...

क्या होता अगर तुम भी मुझे मुझसी मोहब्बत करते ?

क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते… क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते, तो मेरी ख़ामोशी तुम्हें डराती नहीं, बल्कि मेरी आँखों में छुपे शब्द तुम खुद पढ़ लेते। क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते, तो तुम समझ पाते मेरा प्यार कैसा है— बिना शर्त, बिना आवाज़, बस दिल से दिल तक। क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते, तो तुम्हें एहसास होता कि बिना मिले भी किसी से मोहब्बत करना कैसा लगता है, हर दिन तुम्हें याद करना, और फिर भी शिकायत न करना। सोचो… बिना मिले, बिना छुए, बिना देखे अगर मैंने ऐसी मोहब्बत की है, तो हम मिलते तो मेरी मोहब्बत कितनी शिद्दत वाली होती— कितनी सच्ची, कितनी बेइंतहा। क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते, तो मेरी हर छोटी ख़ुशी में तुम्हारी मुस्कान का हिस्सा होता, और मेरे हर डर में तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में। क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते, तो मुझे साबित नहीं करना पड़ता कि मैं काबिल हूँ, तुम्हारा होना ही मेरी तसल्ली बन जाता। शायद तब सवाल कम होते, शिकायतें नहीं होतीं, और “अगर” शब्द मेरी लिखाई में कभी आता ही नहीं…