70 किलोमीटर दूर - आगे
70 किलोमीटर दूर बर्फ़ से ढकी उस दुनिया में सब कुछ तय था। कब चलना है, कहाँ रुकना है, किसके साथ रहना है— पेंग्विनों का समूह हर दिन उसी लय में आगे बढ़ता था। उसी लय में वह भी चलता रहा, बहुत समय तक। उसके पास सब कुछ था— साथ, सुरक्षा, परिचित आवाज़ें। फिर भी उसके भीतर एक सवाल था जो किसी के कंधे से सटकर भी शांत नहीं होता था। एक सुबह, जब हवा असामान्य रूप से शांत थी, वह बिना शोर किए समूह से अलग हो गया। न कोई विदाई, न कोई घोषणा। चलते-चलते ठंड तेज़ होती गई, रास्ता खाली होता गया। कई बार उसे लगा कि वह गलत कर रहा है, कि वापस मुड़ जाना चाहिए। करीब सत्तर किलोमीटर दूर पहुँचकर वह रुक गया। थका हुआ, पर जागा हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा। दूर—बहुत दूर— उसकी दुनिया थी। वही शोर, वही अपनापन, वही लोग जो कभी उसका पूरा आकाश थे। उसकी आँखों में प्रेम था। दुख नहीं। उसे समझ आया कि वह भागा नहीं था। वह खुद को सुनने निकला था। अकेलापन वहाँ था— ठंड की तरह, कभी सहन करने लायक, कभी असहनीय। पर उसी अकेलेपन में उसने अपनी आवाज़ पहचानी। वह जानता था कि रास्ता वापस भी जाता है। और आगे भी। वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा। हवा चलती रही, बर्फ़ गि...