क्या होता अगर तुम भी मुझे मुझसी मोहब्बत करते ?


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते…


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते,

तो मेरी ख़ामोशी तुम्हें डराती नहीं,

बल्कि मेरी आँखों में छुपे शब्द

तुम खुद पढ़ लेते।


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते,

तो तुम समझ पाते

मेरा प्यार कैसा है—

बिना शर्त, बिना आवाज़,

बस दिल से दिल तक।


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते,

तो तुम्हें एहसास होता

कि बिना मिले भी

किसी से मोहब्बत करना कैसा लगता है,

हर दिन तुम्हें याद करना,

और फिर भी शिकायत न करना।


सोचो…

बिना मिले, बिना छुए, बिना देखे

अगर मैंने ऐसी मोहब्बत की है,

तो हम मिलते

तो मेरी मोहब्बत कितनी शिद्दत वाली होती—

कितनी सच्ची, कितनी बेइंतहा।


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते,

तो मेरी हर छोटी ख़ुशी में

तुम्हारी मुस्कान का हिस्सा होता,

और मेरे हर डर में

तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में।


क्या होता अगर तुम भी मुझसे प्यार करते,

तो मुझे साबित नहीं करना पड़ता

कि मैं काबिल हूँ,

तुम्हारा होना ही

मेरी तसल्ली बन जाता।


शायद तब सवाल कम होते,

शिकायतें नहीं होतीं,

और “अगर” शब्द

मेरी लिखाई में कभी आता ही नहीं…

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