अनायास जीना..
आजकल मेरी ज़िंदगी में बस एक ही कॉल आता है—
मम्मा का।
शायद इसलिए क्योंकि उनसे 150 किलोमीटर दूर रहती हूँ।
अब अगर कोई मुझसे पूछे कि लाइफ़ कैसी चल रही है,
तो सच में जवाब नहीं मिलता।
अच्छी है या बुरी—
इस फर्क को महसूस करना ही जैसे छूट गया है।
पहले फोन बजता था।
किसी से बात करना अच्छा लगता था।
किसी की आवाज़ दिन को हल्का कर देती थी,
किसी का हाल पूछना अपना सा लगता था।
अब थोड़ी बोरियत है,
पर उसके साथ एक अजीब-सा सुकून भी है।
खुद के साथ रहना सीख रही हूँ।
शायद यही वो चीज़ है
जो मुझे पहले कभी नहीं आई।
कभी-कभी लगता है
कि मैं इमोशनलेस हो गई हूँ।
ना ज़्यादा खुशी,
ना ज़्यादा दुख।
बस एक ठहराव-सा है।
सुबह उठती हूँ,
चाय पीती हूँ, पढ़ती हूँ,
माँ को अपना हाल बता देती हूँ।
फिर खाना,
थोड़ा काम—
ताकि थोड़ा पैसा कमा सकूँ।
शाम को फिर वही क्रम,
और रात को नींद।
दिन बीतते जाते हैं,
एक जैसे…
बिना किसी शिकायत के।
अब मैं खुद को लोगों के सामने
ज़्यादा एक्सप्रेस नहीं करती।
डर लगता है।
किसी से लगाव हो जाने का डर,
और उससे भी ज़्यादा
किसी को खो देने के दर्द का।
शायद इसलिए अब
न किसी से दोस्ती हो पा रही है,
न किसी से प्यार।
मैं ठीक हूँ—
कम से कम इतना तो कह सकती हूँ।
पर कितनी ठीक हूँ,
ये सवाल अब खुद से भी नहीं पूछती।
अब बस जी रही हूँ।
अनायास।
Comments
Post a Comment