70 किलोमीटर दूर - आगे
70 किलोमीटर दूर
बर्फ़ से ढकी उस दुनिया में सब कुछ तय था।
कब चलना है, कहाँ रुकना है, किसके साथ रहना है—
पेंग्विनों का समूह हर दिन उसी लय में आगे बढ़ता था।
उसी लय में वह भी चलता रहा, बहुत समय तक।
उसके पास सब कुछ था—
साथ, सुरक्षा, परिचित आवाज़ें।
फिर भी उसके भीतर
एक सवाल था
जो किसी के कंधे से सटकर भी
शांत नहीं होता था।
एक सुबह,
जब हवा असामान्य रूप से शांत थी,
वह बिना शोर किए
समूह से अलग हो गया।
न कोई विदाई,
न कोई घोषणा।
चलते-चलते
ठंड तेज़ होती गई,
रास्ता खाली होता गया।
कई बार उसे लगा
कि वह गलत कर रहा है,
कि वापस मुड़ जाना चाहिए।
करीब सत्तर किलोमीटर दूर पहुँचकर
वह रुक गया।
थका हुआ,
पर जागा हुआ।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
दूर—बहुत दूर—
उसकी दुनिया थी।
वही शोर, वही अपनापन,
वही लोग
जो कभी उसका पूरा आकाश थे।
उसकी आँखों में
प्रेम था।
दुख नहीं।
उसे समझ आया
कि वह भागा नहीं था।
वह खुद को सुनने निकला था।
अकेलापन वहाँ था—
ठंड की तरह,
कभी सहन करने लायक,
कभी असहनीय।
पर उसी अकेलेपन में
उसने अपनी आवाज़ पहचानी।
वह जानता था
कि रास्ता वापस भी जाता है।
और आगे भी।
वह कुछ देर
वहीं खड़ा रहा।
हवा चलती रही,
बर्फ़ गिरती रही।
और वह—
अब भी सोच रहा था
कि अगला कदम
किस दिशा में होगा।
( 70 किलोमीटर दूर — आगे )
वह देर तक वहीं खड़ा रहा।
हवा उसके पंखों से टकराती रही,
जैसे पूछ रही हो—
अब क्या?
उसने पहली बार महसूस किया
कि डर कम नहीं हुआ है,
बस पहचान में आ गया है।
और जो डर पहचान में आ जाए,
वह रास्ता रोकता नहीं—
साथ चलने लगता है।
उसने एक कदम आगे बढ़ाया।
न पूरी तरह आगे,
न पूरी तरह पीछे।
बस इतना
कि ठहराव टूट जाए।
चलते हुए
उसे अपनी दुनिया की याद आती रही।
कभी किसी की हँसी,
कभी किसी की आवाज़,
कभी वह सुकून
जो भीड़ में मिल जाता है।
वह यादें बोझ नहीं थीं
वे उसकी गर्माहट थीं।
उसे समझ आया
कि प्रेम कोई जगह नहीं होता,
प्रेम वह एहसास है
जो साथ चल सकता है—
चाहे दूरी हो या पास।
रास्ता आसान नहीं था।
कभी बर्फ़ घुटनों तक आती,
कभी हवा साँस रोक लेती।
कई बार उसे लगा
कि वह फिर अकेला हो गया है।
पर अब यह अकेलापन
पहले जैसा नहीं था।
अब इसमें
डर से ज़्यादा
ईमानदारी थी।
चलते-चलते
वह रुक कर आसमान देखता।
वही आसमान
जो उसकी पुरानी दुनिया पर भी था।
और उसे लगा—
शायद कुछ चीज़ें
दूरी से नहीं बदलतीं।
कहीं आगे
बर्फ़ थोड़ी कम थी।
रास्ता थोड़ा साफ़ था।
या शायद
अब उसकी आँखें
ज़्यादा साफ़ देखने लगी थीं।
वह जानता था
कि उसे फैसला करना पड़ेगा
किसी मोड़ पर,
किसी दिन।
पर आज नहीं।
आज वह बस
चलता रहा।
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