जब सवाल जवाब नहीं माँगते, बस दर्द बन जाते हैं



आजकल मैं खुद को समझ नहीं पा रही हूँ।

समझ नहीं आता कि आगे क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ।

एक सवाल है जो चुपचाप मेरे मन में घर कर गया है—

आख़िर मैं ही क्यों?


तुम्हें सब पता था।

मेरा टूटना,

परिवार की परेशानियाँ,

पिछली मोहब्बत का अंजाम,

और मेरे मन के अंदर चल रहे अनगिनत द्वंद्व।


फिर भी तुम मेरी ज़िंदगी की एक और लड़ाई क्यों बन गए?

तुम मुझे समझा सकते थे।

प्यार नहीं करना था, तो वो भी कह सकते थे।

लेकिन तुमने तो मुझे बिल्कुल अकेला छोड़ दिया—

बिना किसी सहारे के।


आज मेरे पास कोई नहीं है

जिससे मैं अपने जज़्बात बाँट सकूँ।

और इसका असर हर चीज़ पर पड़ रहा है—

मेरी पढ़ाई पर,

मेरे मन पर,

मेरे होने पर।


मैं पढ़ नहीं पा रही हूँ।

मन भटकता रहता है।

तुमने बहुत ग़लत समय पर साथ छोड़ा, यार।


मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर पा रही।

शायद इसलिए नहीं कि मैं बुरी हूँ,

बल्कि इसलिए कि मैं बहुत ज़्यादा टूट चुकी हूँ।


मेरे मन में बहुत कुछ है,

पर शब्द साथ नहीं देते।

तुम शायद मुझसे दूर रहकर खुश हो,

पर मैं खुश नहीं हूँ।


सच कहूँ तो मैं ठीक नहीं हूँ।

मैं कभी कुछ ग़लत नहीं करूँगी—

लेकिन अकेले जीने का मन भी नहीं करता।


मैं तुमसे मिलने से पहले बेहतर थी।

कम से कम इतनी खाली तो नहीं थी।


अब ज़िंदगी में एक और इंसान है—

गुजरात से।

वो बातें करता है,

सपने दिखाता है—

घुमाने के,

चोको लावा केक के,

पहाड़ों में खो जाने के।


मन कहता है बात कर लूँ,

क्योंकि अकेलापन बहुत भारी है।

पर दिल आज भी यही मानता है

कि उससे बात करना

तुम्हें धोखा देना होगा।


ये अजीब बात है न—

जो चला गया,

उसी के प्रति आज भी ईमानदार हूँ।


लेकिन क्या करूँ?

अकेले रहूँगी तो खुद से हार जाऊँगी।

कुछ भी सही नहीं हो रहा।


तुम खुश रहना।

अपना ख़याल रखना।


— तुम्हारी ख़रगोश

और हाँ…

तुम्हारी गलती भी।


अगला पन्ना......  जो मुझे मजबूत बनाता है


मज़बूत अंत


आज भी दर्द है,

आज भी सवाल हैं,

लेकिन अब मैं खुद को पूरी तरह खोने नहीं दूँगी।


मैं मानती हूँ—

मैं टूटी हूँ,

थकी हुई हूँ,

और अभी भी ठीक नहीं हूँ।

पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं कमज़ोर हूँ।


जिसने मुझे सबसे नाज़ुक समय पर छोड़ा,

उसका जाना मेरी हार नहीं था।

वो उसकी असमर्थता थी—

समझने की,

ठहरने की,

और निभाने की।


मैं किसी की आदत बनकर नहीं जीना चाहती,

मुझे साथ चाहिए था—

दया नहीं,

वादा नहीं,

बस मौजूदगी।


अब अगर कोई आएगा,

तो अधूरेपन को भरने नहीं,

बल्कि मेरी सच्चाई को समझने आएगा।


और अगर कोई नहीं भी आया,

तो मैं खुद के साथ रहना सीख लूँगी।

क्योंकि अकेलापन मौत नहीं होता—

गलत साथ होता है।


मैं फिर पढ़ूँगी।

धीरे-धीरे सही,

पर खुद के लिए।


मैं फिर हँसूँगी।

बिना किसी को साबित किए।


और जिस दिन मैं पूरी तरह ठीक हो जाऊँगी,

उस दिन तुम्हारी याद

बस एक सबक बनकर रह जाएगी—

दर्द नहीं।


— तुम्हारी ख़रगोश

और अब…

तुम्हारी गलती से आगे बढ़ती हुई मैं।

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