जाओ तुम..
कुछ रिश्ते हमारे जीवन में इसलिए नहीं आते कि वे हमेशा के लिए ठहर जाएँ,
बल्कि इसलिए आते हैं कि हमें भीतर से बदल दें।
आज मैं उसी समझ के साथ लिख रही हूँ।
एक समय था जब तुमसे मिलने की चाह थी,
तुम्हें देखने की उत्सुकता थी।
लेकिन अब उस मोह को मैंने स्वयं से विदा कर दिया है।
अब न कोई आग्रह शेष है, न कोई ज़िद।
जो बचा है, वह है शांति—
और हालात को जैसे हैं वैसे स्वीकार करने की क्षमता।
प्रेम की बात करूँ तो,
प्रेम कभी किसी चाह पर निर्भर नहीं होता।
वह किसी उपस्थिति का मोहताज नहीं होता।
वह तो एक भाव है,
जो भीतर जन्म लेता है और वहीं ठहर जाता है।
वही भाव अब भी मेरे भीतर है—
शांत, स्थिर और मौन।
आज मेरी एकमात्र प्रार्थना यही है
कि ईश्वर तुम्हें सुरक्षित रखे।
तुम जहाँ भी रहो, जैसे भी रहो,
जीवन तुम्हें सुकून दे—
और तुम भीतर से खुश रहो।
कहीं न कहीं, मेरे भीतर से कुछ हट गया है।
अब न तुम्हारे साथ होने का मोह बचा है,
न इस रिश्ते को सही या सच साबित करने की कोई आवश्यकता।
तुम न पूरी तरह सही थे, न पूरी तरह ग़लत—
तुम बस एक अनुभव थे,
एक क्षण जो आया… और समय के साथ चला गया।
अब शब्द उतनी तीव्रता से याद नहीं रहते,
साथ का एहसास अब स्पर्श नहीं करता,
और परवाह अब सवाल नहीं बनती।
जो कुछ भी था,
वह वहीं छूट गया
जहाँ मेरी आत्मा ने मौन को चुन लिया।
इस विदाई में न कोई शिकवा है,
न कोई धन्यवाद,
न कोई औपचारिक अलविदा।
बस एक शांत स्वीकार है—
और एक आंतरिक विराम।
आज मैं अपने साथ खुश हूँ।
इसलिए मेरी प्रोफ़ाइल देखने भी मत आना,
क्योंकि कभी-कभी पुरानी यादें
गिल्ट बनकर लौट आती हैं
और बिना वजह इंसान को उलझा देती हैं।
मैं यह भी चाहती हूँ कि
तुम कभी लौटकर
मेरा हाल पूछने मत आना।
क्योंकि कुछ दरवाज़े
एक बार बंद हो जाएँ
तो उनका फिर से खुलना
सिर्फ़ दर्द को जन्म देता है।
मैं जानती हूँ,
अगर तुम लौटे तो मैं फिर टूट सकती हूँ,
और खुद को संभालना
शायद आसान न रहे।
इसलिए, बिना किसी भावना के वापस मत आना।
और बस…
जहाँ भी रहो, खुश रहना।
कभी-कभी सबसे सच्चा प्रेम
यही होता है—
दूर रहकर भी
शुभकामनाएँ देना।
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