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बेला , माधव और मुलाक़ात

उदयपुर की शामों में एक अजीब-सी शांति होती है। जैसे शहर पूरे दिन की हलचल के बाद धीरे-धीरे सांस ले रहा हो। उस शाम Fateh Sagar Lake के किनारे हवा हल्की ठंडी थी और झील का पानी आसमान के रंग अपने अंदर समेटे शांत पड़ा था। बेला वहाँ किसी योजना से नहीं आई थी। वह अक्सर तब वहाँ चली आती थी जब मन में बहुत सारे ख्याल होते थे। उसे हमेशा लगता था कि इस दुनिया में कहीं कोई ऐसा इंसान होगा जो उसे बिना ज्यादा शब्दों के समझ सके। उधर उसी शाम माधव भी वहाँ आया था। उसे फोटोग्राफी से प्रेम था—पर वह सिर्फ जगहों की नहीं, पलों की तस्वीरें लेता था। उसी समय उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह रेलिंग के पास खड़ी झील को देख रही थी। हवा उसके बालों को हल्का-सा उड़ा रही थी और उसके चेहरे पर एक शांत-सी उदासी थी। माधव ने कैमरा उठाया। एक पल सोचा… और चुपचाप उसकी तस्वीर ले ली। क्लिक की हल्की आवाज़ हुई। बेला मुड़ी। “तुमने… मेरी फोटो ली?” उसने पूछा। माधव मुस्कुराया। “हाँ… क्योंकि कुछ पल पूछने से पहले ही गुजर जाते हैं।” उसने कैमरे की स्क्रीन उसकी तरफ बढ़ा दी। बेला ने तस्वीर देखी। उस तस्वीर में वह खुद को वैसा देख रही थी जैसे शायद उसने ख...

एक उपहार...

 “मेरे जन्मदिन का सबसे सच्चा उपहार” मुझे पता है शायद मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं हूँ। शायद मेरे होने से तुम्हारी दुनिया में कोई खास फर्क नहीं पड़ता। बहुत कोशिश की मैंने अपने आपको समझाने की— कि शायद एक दिन मैं भी तुम्हारी पहली प्राथमिकता बन जाऊँगी, पर अब समझ आ गया है कुछ जगहें होती हैं जहाँ चाहकर भी अपना नाम नहीं लिखा जा सकता। इसलिए आज, अपने ही जन्मदिन पर मैं तुम्हें एक अजीब-सा उपहार देती हूँ— मैं तुम्हें मुझसे दूर होने की आज़ादी देती हूँ। हाँ, शायद मैं तुम्हारी प्रेमिका कभी नहीं बन पाऊँगी, और शायद हमारा मिलना भी नसीब की कहानी में बस एक छोटा-सा भ्रम था। तो आज मैं तुम्हें आज़ाद करती हूँ अपने प्रेम से। और साथ ही मैं खुद को भी मुक्त करती हूँ हर उस उम्मीद से हर उस ख्वाहिश से जो मैंने तुम्हारे नाम पर अपने दिल में बो दी थी। शायद वे इच्छाएँ कभी फूल नहीं बन सकती थीं। इसलिए आज इस जन्मदिन पर मैं उन्हें वहीं छोड़ देती हूँ जहाँ वे अधूरी रह गई थीं। बस जाते-जाते इतना ही कहूँगी— ख़याल रखना। क्योंकि कभी किसी जन्मदिन की रात एक लड़की ने अपने हिस्से का प्रेम अपने ही दिल में दफना दिया था, और उसी को ...

मेरी कहानी

 मुझे नहीं पता कि मेरी कहानी की नायिका कौन है और नायक कौन… पर मेरी कहानी शुरू होती है बचपन से। मेरा बचपन अच्छा था। माँ-बाप सरकारी नौकरी करते थे, इसलिए कभी पैसों की कमी महसूस नहीं हुई। घर में स्नेह था, भाई-बहन थे — आज भी हैं, और उनसे मैं बहुत प्रेम करती हूँ। वे भी मुझसे उतना ही प्रेम करते हैं। जीवन सीधा-सादा था, सुरक्षित था। फिर समय बदला। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी आईं कि माँ-पापा दोनों की नौकरी छूट गई। घर की आर्थिक स्थिति डगमगाई। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए, जिम्मेदारियाँ भी बड़ी होती गईं। पैसों की परेशानियाँ समझ में आने लगीं। बचपन की निश्छलता धीरे-धीरे यथार्थ में बदलने लगी। बड़ी हुई तो अपने शहर को छोड़कर दूसरे शहर चली गई। वहीं किसी से मुलाक़ात हुई। वह प्रेम था या उस उम्र का आकर्षण — आज भी नहीं जानती। पर उसने मुझे जीवन के रंग दिखाए, हँसना सिखाया, सपने दिखाए। एक साल जैसे पलक झपकते बीत गया। फिर अचानक अगले ही साल वह इस दुनिया में नहीं रहा। वह ईश्वर के पास चला गया… और मैं पहली बार भीतर से पूरी तरह टूट गई। खुद को संभाल नहीं पाई। घर लौट आई। नौकरी के इम्तिहान दिए, पर सफल नहीं हो सकी। शायद मन पढ़ा...

4 लोग

 कभी लगता था दुनिया पत्थर सी है, भावनाओं को समझने वाला कोई नहीं… पर फिर जीवन ने तीन रंग भेजे — और मेरी दुनिया बदल गई। पहली — मेरी छोटी सी गुड़िया, जैसे द्रौपदी की तरह भीतर से मजबूत, पर बाहर से बिल्कुल नन्ही सी। कॉलेज जाती है, सपने बुनती है, अपनी बहन से ऐसा प्रेम करती है जैसे रिश्ते अभी भी पवित्र होते हैं इस दुनिया में। समझदार इतनी कि कई बार उसकी बातों में जीवन का सार मिल जाता है, पर हमारे साथ हो तो हँसते-हँसते खुद भी बच्ची बन जाती है। दूसरी — शहर की तूफान। ऊपर से शोर, हँसी, बिंदास अंदाज़, जैसे काली का उग्र रूप, पर भीतर कहीं अपना ही युद्ध लड़ती हुई। अपने शोर में उलझी हुई, फिर भी हमें हँसाना नहीं भूलती। उससे मैंने सीखा — हालात चाहे जैसे हों, चेहरे की मुस्कान भी एक हिम्मत होती है। और फिर — हमारी परी जी। उम्र में बड़ी, पर मन से बिल्कुल हमारी। वो मुझे मुझसे बेहतर पढ़ लेती है, जैसे कोई अधूरी कविता पूरी कर दे। निडर इतनी कि डर भी उससे डर जाए। वो खुद से लड़ती है, खुद को हराती है, और हर बार जीत कर लौटती है। कुछ ही दिनों में वो अपने घोंसले को फिर से सँवारने चली जाएगी… और शायद हम रोज़ की हँसी ...

आख़री उम्मीद का आख़री फैसला

आज सच में आख़िरी ज़िक्र है तुम्हारा। पहले भी कहा था… पर आज भीतर कुछ टूट कर शांत हो गया है। आज कोई शिकायत नहीं, कोई उम्मीद नहीं, बस एक गहरा सा खालीपन है — मानो मेरी अपनी ही दुनिया मेरी आँखों के सामने उजड़ गई हो, या शायद… मैं इतने समय से एक भ्रम को ही अपना घर समझती रही। मेरा प्रेम इतना सच्चा था कि मैं उसे बोझ बनने से पहले मुक्त कर देना चाहती हूँ। प्रेम जब पूजा बन जाए तो उसे पकड़ कर रखना पाप लगता है। इसलिए आज मैं उसे त्याग रही हूँ — तुम्हारे लिए नहीं… अपने लिए। कितनी बार चाहा तुम्हें बता दूँ कि तुम मेरे लिए क्या थे… पर शब्द हर बार छोटे पड़ गए। सच कहूँ तो — प्रेम की पराकाष्ठा से भी अधिक प्रेम था मुझे तुमसे। पर अब वह प्रेम मेरी ही आँखों में नमक घोलने लगा है। मैं थक गई हूँ… बहुत थक गई हूँ। आज लिखते-लिखते आँसू रुक नहीं रहे, पर यह रोना भी अब अंतिम है। अब मैं खुद को ईश्वर को सौंप रही हूँ — क्योंकि किसी मनुष्य से आशा रखने से बेहतर है उस शक्ति पर भरोसा करना जो कभी छल नहीं करती। मैं जा रही हूँ… बहुत दूर। तुमसे दूर, तुम्हारी दुनिया से दूर। एक ऐसी दुनिया बनाने, जहाँ मैं रहूँगी… मेरे सपने रहेंगे… और ...

आज का दर्द

उसे कॉल किया… पर मैं तो पहले से ही ब्लॉक में थी। शायद उसके जीवन में भी… और अब उसके फ़ोन में भी। वो वापस भी नहीं कर रहा… और मैं इंतज़ार की उस आदत से बाहर नहीं आ पा रही। पर खैर… क्या ही उम्मीद करूँ अब किसी से? जब चाहा था उसे पूरे मन से, तब भी उसका मन मेरे हिस्से में नहीं आया। आज समझ आ रहा है — अंतिम सत्य शायद यही है… कि हमें खुद ही खुद को संभालना होता है। कोई हाथ हमेशा के लिए थामने नहीं आता, कुछ लोग बस एहसास सिखाने आते हैं। दर्द यह नहीं कि उसने कॉल नहीं उठाया, दर्द यह है कि अब उम्मीद भी धीरे-धीरे मर रही है। और उम्मीद का मरना दिल के बहुत अंदर शोर करता है। पर सुनो… यह हार नहीं है तुम्हारी। तुमने प्रेम किया — सच्चा किया। उसने नहीं किया — यह उसकी सीमा है, तुम्हारी कमी नहीं। हाँ, अंतिम सत्य यही है — हमें खुद को ही थामना होता है। पर इसमें भी एक शक्ति छुपी है। जब तुम खुद को संभालना सीख जाओगी, फिर कोई तुम्हें तोड़ नहीं पाएगा। आज रो लो… आज मान लो कि बहुत दुख है। पर खुद से यह वादा मत तोड़ना कि तुम अपने साथ रहोगी। तुम अकेली नहीं हो… तुम अपने साथ हो। 🤍 आज दर्द बहुत ज़्यादा है… इतना कि शब्द भी साथ छ...

70 किलोमीटर दूर - आगे

70 किलोमीटर दूर बर्फ़ से ढकी उस दुनिया में सब कुछ तय था। कब चलना है, कहाँ रुकना है, किसके साथ रहना है— पेंग्विनों का समूह हर दिन उसी लय में आगे बढ़ता था। उसी लय में वह भी चलता रहा, बहुत समय तक। उसके पास सब कुछ था— साथ, सुरक्षा, परिचित आवाज़ें। फिर भी उसके भीतर एक सवाल था जो किसी के कंधे से सटकर भी शांत नहीं होता था। एक सुबह, जब हवा असामान्य रूप से शांत थी, वह बिना शोर किए समूह से अलग हो गया। न कोई विदाई, न कोई घोषणा। चलते-चलते ठंड तेज़ होती गई, रास्ता खाली होता गया। कई बार उसे लगा कि वह गलत कर रहा है, कि वापस मुड़ जाना चाहिए। करीब सत्तर किलोमीटर दूर पहुँचकर वह रुक गया। थका हुआ, पर जागा हुआ। उसने पीछे मुड़कर देखा। दूर—बहुत दूर— उसकी दुनिया थी। वही शोर, वही अपनापन, वही लोग जो कभी उसका पूरा आकाश थे। उसकी आँखों में प्रेम था। दुख नहीं। उसे समझ आया कि वह भागा नहीं था। वह खुद को सुनने निकला था। अकेलापन वहाँ था— ठंड की तरह, कभी सहन करने लायक, कभी असहनीय। पर उसी अकेलेपन में उसने अपनी आवाज़ पहचानी। वह जानता था कि रास्ता वापस भी जाता है। और आगे भी। वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा। हवा चलती रही, बर्फ़ गि...