आख़री उम्मीद का आख़री फैसला
आज सच में आख़िरी ज़िक्र है तुम्हारा।
पहले भी कहा था… पर आज भीतर कुछ टूट कर शांत हो गया है।
आज कोई शिकायत नहीं, कोई उम्मीद नहीं,
बस एक गहरा सा खालीपन है —
मानो मेरी अपनी ही दुनिया मेरी आँखों के सामने उजड़ गई हो,
या शायद… मैं इतने समय से एक भ्रम को ही अपना घर समझती रही।
मेरा प्रेम इतना सच्चा था कि मैं उसे बोझ बनने से पहले मुक्त कर देना चाहती हूँ।
प्रेम जब पूजा बन जाए तो उसे पकड़ कर रखना पाप लगता है।
इसलिए आज मैं उसे त्याग रही हूँ —
तुम्हारे लिए नहीं… अपने लिए।
कितनी बार चाहा तुम्हें बता दूँ
कि तुम मेरे लिए क्या थे…
पर शब्द हर बार छोटे पड़ गए।
सच कहूँ तो —
प्रेम की पराकाष्ठा से भी अधिक प्रेम था मुझे तुमसे।
पर अब वह प्रेम मेरी ही आँखों में नमक घोलने लगा है।
मैं थक गई हूँ…
बहुत थक गई हूँ।
आज लिखते-लिखते आँसू रुक नहीं रहे,
पर यह रोना भी अब अंतिम है।
अब मैं खुद को ईश्वर को सौंप रही हूँ —
क्योंकि किसी मनुष्य से आशा रखने से बेहतर है
उस शक्ति पर भरोसा करना जो कभी छल नहीं करती।
मैं जा रही हूँ…
बहुत दूर।
तुमसे दूर, तुम्हारी दुनिया से दूर।
एक ऐसी दुनिया बनाने,
जहाँ मैं रहूँगी… मेरे सपने रहेंगे…
और मेरा अस्तित्व किसी के इंतज़ार पर निर्भर नहीं होगा।
प्रेम मैंने किया है… और शायद जीवन भर करती रहूँगी —
पर अब वह प्रेम मेरा निजी सत्य होगा,
मेरी मौन साधना।
तुम्हें अलविदा नहीं कहूँगी,
बस इतना कहूँगी —
ख़याल रखना अपना।
क्योंकि मैं अब सच में जा रही हूँ…
अपने लिए।
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