मेरी कहानी

 मुझे नहीं पता कि मेरी कहानी की नायिका कौन है और नायक कौन…

पर मेरी कहानी शुरू होती है बचपन से।


मेरा बचपन अच्छा था। माँ-बाप सरकारी नौकरी करते थे, इसलिए कभी पैसों की कमी महसूस नहीं हुई। घर में स्नेह था, भाई-बहन थे — आज भी हैं, और उनसे मैं बहुत प्रेम करती हूँ। वे भी मुझसे उतना ही प्रेम करते हैं। जीवन सीधा-सादा था, सुरक्षित था।


फिर समय बदला। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी आईं कि माँ-पापा दोनों की नौकरी छूट गई। घर की आर्थिक स्थिति डगमगाई। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए, जिम्मेदारियाँ भी बड़ी होती गईं। पैसों की परेशानियाँ समझ में आने लगीं। बचपन की निश्छलता धीरे-धीरे यथार्थ में बदलने लगी।


बड़ी हुई तो अपने शहर को छोड़कर दूसरे शहर चली गई। वहीं किसी से मुलाक़ात हुई। वह प्रेम था या उस उम्र का आकर्षण — आज भी नहीं जानती। पर उसने मुझे जीवन के रंग दिखाए, हँसना सिखाया, सपने दिखाए। एक साल जैसे पलक झपकते बीत गया। फिर अचानक अगले ही साल वह इस दुनिया में नहीं रहा। वह ईश्वर के पास चला गया… और मैं पहली बार भीतर से पूरी तरह टूट गई।


खुद को संभाल नहीं पाई। घर लौट आई। नौकरी के इम्तिहान दिए, पर सफल नहीं हो सकी। शायद मन पढ़ाई में कम और यादों में ज़्यादा अटका था।


इसी बीच सोशल मीडिया की दुनिया में कदम रखा। वहाँ एक और लड़के से मुलाक़ात हुई। बातें हुईं, विश्वास बना, फिर वही विश्वास टूटा। लगा जैसे मैं भरोसा करना सीखती हूँ और दुनिया उसे तोड़ना।


फिर एक और व्यक्ति से मिली। बहुत बातें हुईं। लगा कि शायद इस बार सहेजता है, अपनापन है, शायद हम मिल सकते हैं, साथ बैठ सकते हैं — बालकनी में चाय पीते हुए पुराने गीत सुन सकते हैं, आगे का जीवन साथ सोच सकते हैं।


पर अब कभी-कभी लगता है… शायद यह सहेजता नहीं होना चाहिए था। शायद वह मुझ पर विश्वास नहीं करता। शायद अपनी भावनाओं से डरता है। या शायद उसके भीतर वैसी भावनाएँ हैं ही नहीं। और कभी लगता है — कहीं यह सब मेरे मन का भ्रम तो नहीं?


मैं उससे बहुत प्रेम करती हूँ — इतना कि शायद खुद को उसमें खो बैठी हूँ। लोग कहते हैं आज के समय में निस्वार्थ प्रेम करना सही नहीं। पर मेरा दिल तर्क नहीं समझता। वह बस प्रेम समझता है।


कभी-कभी सोचती हूँ — मैंने अपना समय उसे दिया, क्या गलत किया? मैंने दिल से बातें कीं, क्या गलत किया?

आज मैं किसी और से जुड़ नहीं पा रही — तो गलती किसकी है? उसकी, जो मुझे प्रेम नहीं कर पाया?

या मेरी, जो उसी मोड़ पर ठहर गई?


सच यह है कि आज भी मैं उसी से जुड़ी हूँ। शायद अभी भी वहीं ठहरी हुई हूँ।

आदर्शों में मैंने कुछ दोस्तियाँ खो दीं, कुछ रिश्ते खो दिए, शायद खुद को भी थोड़ा खो दिया।

पर अब एक चीज़ थामे हूँ — अपने दिल का विश्वास।


मैं इंतज़ार कर रही हूँ…

कि वह लौट आए।

कि वह मेरे प्रेम को समझे।

कि वह मुझे समझे।


पर अब इस इंतज़ार में मैं खुद को खोना नहीं चाहती।

मैंने सीखा है — प्रेम करना कमजोरी नहीं, साहस है।

अगर मेरा प्रेम सच्चा है तो वह लौटे या न लौटे, यह प्रेम मुझे और मजबूत बनाएगा।


मैं अब हर सुबह खुद को याद दिलाती हूँ —

मैं सिर्फ किसी के लौट आने का इंतज़ार नहीं हूँ,

मैं एक पूरी कहानी हूँ।


अगर वह लौट आया, तो शायद कहानी वैसी होगी जैसी मैंने सोची है।

और अगर नहीं लौटा…

तो मैं अपनी कहानी खुद पूरी करना सीख जाऊँगी।


क्योंकि अब मेरा सबसे बड़ा सहारा

किसी का लौटना नहीं,

बल्कि खुद पर मेरा विश्वास है। 🤍

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