आख़री पन्ना
प्रिय अंकेश 🐒, तुमने कहा, तुमने कभी मुझसे प्रेम नहीं किया, मैं तुम्हारे लिए कभी विशेष नहीं थी। तुम्हारा यह भी कहना था कि मैंने तुम्हें ज़बरदस्ती प्रेमी की जगह दे दी, और तुम मुझसे किसी और की गारंटी के कारण बात करते रहे। तो कभी खुद से सवाल करना क्या सच मे मेने ओर तुमने जो सहजता पाई थी वो सच थी ? या तुम्हारा मुझे आख़री उम्मीद कहना सच था ? ओर सच मे तुम्हे लगता है की मेने तुम्हे कभी छोट पहुंचाने के बारे मे सोचा भी होगा ? बस एक सवाल मन में रह गया क्या कभी मेरी किसी बात, मेरी किसी भावना ने तुम्हें असहज किया? शायद मैंने ज़्यादा चाह लिया, शायद ज़्यादा सच्चाई से निभा लिया। और धीरे-धीरे मैं ही तुम्हारी कहानी की सबसे आसान गलती बन गई। यह साल सच में बहुत अजीब रहा कभी उम्मीद, कभी ख़ामोशी, कभी मुस्कान, कभी टूटन के साथ चुपचाप गुजर गया। आख़िर में बस इतना कहना है कि मैंने तुमसे प्रेम के अलावा कभी कुछ और चाहा ही नहीं ना वादे, ना हक़, ना किसी तरह का दबाव। अगर कहीं मेरी भावनाओं ने तुम्हें बोझ सा महसूस करवाया हो, तो उसके लिए मैं ख़ामोशी से माफ़ी भी चाहती हूँ। अब तुम खुश रहना। जो भी सपने देखे हैं, उन्हें...