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Showing posts from December, 2025

आख़री पन्ना

प्रिय अंकेश 🐒, तुमने कहा, तुमने कभी मुझसे प्रेम नहीं किया, मैं तुम्हारे लिए कभी विशेष नहीं थी। तुम्हारा यह भी कहना था कि मैंने तुम्हें ज़बरदस्ती प्रेमी की जगह दे दी, और तुम मुझसे किसी और की गारंटी के कारण बात करते रहे। तो कभी खुद से सवाल करना  क्या सच मे मेने ओर तुमने जो सहजता पाई थी वो सच थी ? या तुम्हारा मुझे आख़री उम्मीद कहना सच था ? ओर सच मे तुम्हे लगता है की मेने तुम्हे कभी छोट पहुंचाने के बारे मे सोचा भी होगा ? बस एक सवाल मन में रह गया क्या कभी मेरी किसी बात, मेरी किसी भावना ने तुम्हें असहज किया? शायद मैंने ज़्यादा चाह लिया, शायद ज़्यादा सच्चाई से निभा लिया। और धीरे-धीरे मैं ही तुम्हारी कहानी की सबसे आसान गलती बन गई। यह साल सच में बहुत अजीब रहा कभी उम्मीद, कभी ख़ामोशी, कभी मुस्कान, कभी टूटन के साथ चुपचाप गुजर गया। आख़िर में बस इतना कहना है कि मैंने तुमसे प्रेम के अलावा कभी कुछ और चाहा ही नहीं ना वादे, ना हक़, ना किसी तरह का दबाव। अगर कहीं मेरी भावनाओं ने तुम्हें बोझ सा महसूस करवाया हो, तो उसके लिए मैं ख़ामोशी से माफ़ी भी चाहती हूँ। अब तुम खुश रहना। जो भी सपने देखे हैं, उन्हें...

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यार, मैं ठीक महसूस नहीं कर रही हूँ। कई दिनों से मन बहुत भारी है। अब सोचती हूँ, अगर इस साल के साथ खुद को नहीं बदला, तो शायद खुद को संभाल नहीं पाऊँगी — बिल्कुल अकेले। और सच कहूँ तो कोई है भी नहीं जो चुपचाप मेरा हाथ पकड़ कर कह दे कि “मैं हूँ, डर मत।” अब तो मुझे खुद नहीं पता कि मेरी चाहत क्या है। कभी लगता है मुझे प्रेम चाहिए, कभी लगता है बस थोड़ा सा अपनापन। न मैं प्रेम करना बंद कर पा रही हूँ, न तुमसे शिकायत कर पा रही हूँ, क्योंकि शिकायत करने का हक़ शायद उसी को होता है जिसे परवाह हो। खुद को संभालने की कोशिश करती हूँ, पर हर बार बिखर जाती हूँ। न रो ठीक से पाती हूँ, न मजबूत बन पाती हूँ। और फिर भी, तुम्हें याद करना बंद नहीं कर पाती। जब तुम्हें कुछ कहने का ख्याल आता है, तो सोचती हूँ लाड़ूँ तुमसे, अपने सारे डर, सारी थकान तुम्हारी गोद में रख दूँ। फिर खुद को रोक लेती हूँ। क्योंकि अगर तुम मोहब्बत करते, तो मुझे यह सब सोचना ही नहीं पड़ता, मुझे यूँ खुद को समझाना नहीं पड़ता। अब बस ऐसा लगता है कि हमारे बीच कुछ भी नहीं है। ना वो अपनापन, ना वो फिक्र, जो कभी मुझे जिंदा-सा महसूस कराती थी। जो भी है, सब एकतरफ़...

डायरी का वो पन्ना

मैं तुम्हें कभी ठीक-ठीक बता नहीं पाऊँगी कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ। शायद इसलिए नहीं कि कहना नहीं आता, बल्कि इसलिए कि ये प्यार शब्दों से बड़ा हो चुका है। कभी-कभी तो मुझे खुद भी नहीं पता चलता कि ये एहसास कब मेरी आदत बन गया— सुबह की पहली सोच में, शाम की थकान में, और रात की ख़ामोशी में तुम चुपचाप शामिल हो गए। मैं कहीं भी जाती हूँ, किसी नई जगह, किसी नए शहर में, तो तुम्हें ढूँढ लेती हूँ अपने आस-पास, किसी अनजान चेहरे में, किसी जानी-पहचानी मुस्कान में, कभी हवा के स्पर्श में, तो कभी किसी अधूरे गीत में। न जाने क्यों, तुम्हें महसूस करके मेरे भीतर एक सुकून उतर आता है, जैसे सब ठीक हो जाएगा… जैसे मैं अकेली नहीं हूँ। और फिर ये ख़याल आता है— अगर न मिलने पर इतनी शिद्दत है, अगर दूर रहकर भी दिल इतना बेचैन है, तो सोचो… हम मिल जाएँ तो क्या होगा? शायद मैं कुछ कह न पाऊँ, शायद बस चुपचाप तुम्हें देखती रहूँ, या शायद सारी ज़िंदगी की अधूरी बातें एक ही पल में कह दूँ। बस इसी सोच से मैं खुद ही मुस्कुरा देती हूँ, और थोड़ी देर के लिए दुनिया आसान लगने लगती है। मुझे नहीं पता कि मुझे तुमसे मोहब्बत क्यों है, न ही य...

एक पत्र

प्रिय अंकेश 🐒 आज मैं तुम्हें यह पत्र इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि बोल पाना अब आसान नहीं रहा। शब्द भीतर तो हैं, पर किसी के सामने ठहर नहीं पाते। मैं ठीक नहीं हूँ। यह लिखते हुए भी मुझे नहीं पता कि ठीक न होने की असली वजह क्या है। आज अनायास ही रो पड़ी— न कोई बहस, न कोई यादों की तैयारी। बस अचानक। शायद तुम्हें सोच रही थी, या शायद अपनी किस्मत से थक गई थी। अब फर्क करना भी मुश्किल हो गया है। मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पा रही हूँ। लोग हैं मेरे आसपास, दोस्त हैं, बातें हैं, पर भीतर कहीं एक ऐसा सन्नाटा है जो किसी आवाज़ से भरता नहीं। आज रसोई में बर्तन धोते हुए अचानक आँखें भर आईं। पानी बह रहा था और आँसू भी। किसी ने देखा नहीं, पर मैंने खुद को पहली बार सच में टूटते देखा। तुमसे मिलने से पहले जो मैं थी, वो कहीं खो गई है। वो जो खुद पर भरोसा करती थी, जो हल्की-सी बात पर भी जीवन से जुड़ जाती थी। अगर मुमकिन हो तो उसे ढूँढकर मुझे लौटा दो। मुझे तुम्हारा साथ नहीं चाहिए— मैं जानती हूँ तुम अब साथ नहीं दे सकते। बस मेरी वही पहचान मुझे वापस दे दो जो तुम्हारे जाते ही कहीं पीछे छूट गई। मैं तुम्हें असहज नहीं करना चाहती। ...

मुलाक़ात

 मुलाक़ात कुछ मुलाक़ातें योजना बनाकर नहीं होतीं, वे बस घट जाती हैं— बिल्कुल वैसे ही, जैसे किसी भूले हुए गीत की धुन अचानक कानों में उतर आए। उस दिन एग्ज़ाम का सेंटर उसके शहर में पड़ा था। मैं पढ़ाई और प्रश्नपत्र के बीच खुद को समेटे हुई थी, पर मन कहीं और भटक रहा था। दिल के किसी कोने में एक हल्की-सी उम्मीद थी— शायद उसे महसूस कर पाऊँ, शायद उसी हवा में उसकी मौजूदगी मिल जाए। और फिर… वह सामने था। कोई नाटकीय प्रवेश नहीं, कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं— बस एक साधारण-सा पल, जिसने भीतर सब कुछ हिला दिया। उसे देखा— एक मासूम-सा पुरुष, जो ख़ुद में खोया रहता है। एक हाथ में सिगरेट, दूसरे हाथ में चाय का कप। सर्दियाँ थीं, उसने जैकेट पहन रखी थी, पर चेहरा… चेहरा तो छुपाया नहीं जा सकता। मैं दूर खड़ी रही। इतनी दूर कि वह मुझे न देख सके, और इतनी पास कि मैं उसे महसूस कर सकूँ। उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शायद डर था— कि कहीं एक पल की बातचीत सालों की चुप्पी तोड़ न दे, या फिर यह डर था कि अगर वह देख ले, तो मैं बिखर जाऊँगी। मैं उसे निहारती रही, जैसे कोई आख़िरी बार आसमान को देखता है। बिना छुए, बिना माँगे, बस आँखो...

पहली हवाई यात्रा

 मेरी पहली हवाई यात्रा: बादलों के पार एक नया संसार इंसान का हमेशा से सपना रहा है कि वो पक्षियों की तरह आसमान में उड़े। जब मैंने पहली बार हवाई जहाज़ के सफर का मन बनाया, तो मेरे मन में उत्साह और थोड़ी घबराहट दोनों का मिश्रण था। वह दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे रोमांचक दिनों में से एक था। 1. एयरपोर्ट का नज़ारा और तैयारी जैसे ही मैंने एयरपोर्ट के भीतर कदम रखा, वहाँ की चमक-धमक और अनुशासन देखकर मैं दंग रह गई । चेक-इन काउंटर से लेकर सिक्योरिटी चेक तक की प्रक्रिया मेरे लिए बिल्कुल नई थी। अपनी बोर्डिंग पास हाथ में लेकर जब मैं गेट की ओर बढ़ा, तो सामने बड़े-बड़े विमानों को खड़ा देख मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। 2. 'टेक-ऑफ' का जादुई पल जैसे ही विमान ने रनवे पर दौड़ना शुरू किया, मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। कुछ ही सेकंड में, एक तेज़ आवाज़ के साथ विमान ने ज़मीन छोड़ दी। वह पल जब विमान ऊपर की ओर उठता है और ज़मीन नीचे छूटती जाती है, शब्दों में बयान करना मुश्किल है। नीचे दिखती ऊँची इमारतें धीरे-धीरे माचिस की डिब्बियों जैसी और कारें छोटे खिलौनों जैसी दिखने लगीं। 3. बादलों की दुनिया में प्रवेश जब विमान हज़ारों फीट की ...

Mokita कि कहानी

                    - खुद से एक मुलाक़ात - मैं ये कहानी इसलिए नहीं लिख रही कि कोई मुझे समझे, बल्कि इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि अब मैं खुद को समझना चाहती हूँ। मैं हमेशा इतनी मजबूत नहीं थी जितनी आज दिखती हूँ। कभी-कभी तो मैं बस चुप रहना सीख गई थी क्योंकि बोलने से कुछ बदलता नहीं था, और समझाने की कोशिशें अक्सर मुझे ही थका देती थीं। मेरे जीवन में प्रेम आया, पर उसके साथ भ्रम भी आया— ये भ्रम कि किसी के लिए ज़रूरी होना ही सब कुछ है। समय के साथ समझ में आया कि ज़रूरी होना और चुना जाना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं। मैंने बहुत कुछ सहा, पर सबसे ज़्यादा मैंने खुद को रोका— अपने सवालों से, अपने दर्द से, और उस सच से जो हर रात मेरी खामोशी में चीख़ता था। ये किताब किसी आदर्श जीवन की कहानी नहीं है। ये उन पलों की कहानी है जहाँ मैं टूटी, फिर खुद को समेटा, और धीरे-धीरे खुद के पास लौट आई। अगर ये शब्द किसी को सुकून दें तो अच्छा है। और अगर ये सिर्फ मुझे ही बचा पाएँ तो भी ये लिखना ज़रूरी था।         📖 प्रस्तावना (Preface) यह पन्नों का पुल किसी भव्य शु...