मुलाक़ात

 मुलाक़ात


कुछ मुलाक़ातें योजना बनाकर नहीं होतीं, वे बस घट जाती हैं— बिल्कुल वैसे ही, जैसे किसी भूले हुए गीत की धुन अचानक कानों में उतर आए।


उस दिन एग्ज़ाम का सेंटर उसके शहर में पड़ा था। मैं पढ़ाई और प्रश्नपत्र के बीच खुद को समेटे हुई थी, पर मन कहीं और भटक रहा था। दिल के किसी कोने में एक हल्की-सी उम्मीद थी— शायद उसे महसूस कर पाऊँ, शायद उसी हवा में उसकी मौजूदगी मिल जाए।


और फिर… वह सामने था।


कोई नाटकीय प्रवेश नहीं, कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं— बस एक साधारण-सा पल, जिसने भीतर सब कुछ हिला दिया।


उसे देखा— एक मासूम-सा पुरुष, जो ख़ुद में खोया रहता है। एक हाथ में सिगरेट, दूसरे हाथ में चाय का कप। सर्दियाँ थीं, उसने जैकेट पहन रखी थी, पर चेहरा… चेहरा तो छुपाया नहीं जा सकता।


मैं दूर खड़ी रही। इतनी दूर कि वह मुझे न देख सके, और इतनी पास कि मैं उसे महसूस कर सकूँ।


उसके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। शायद डर था— कि कहीं एक पल की बातचीत सालों की चुप्पी तोड़ न दे, या फिर यह डर था कि अगर वह देख ले, तो मैं बिखर जाऊँगी।


मैं उसे निहारती रही, जैसे कोई आख़िरी बार आसमान को देखता है। बिना छुए, बिना माँगे, बस आँखों में भर लेने के लिए।


फिर वह अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा। मेरे क़दम भी अपने आप उसी दिशा में उठ गए— उसे आख़िरी बार आँखों में समा लेने की ख़्वाहिश लिए।


और फिर वह ओझल हो गया।


न कोई विदा, न कोई वादा, न कोई शिकवा। सिर्फ़ एक दृश्य, जो भीतर कहीं स्थायी हो गया।


मैं लौट आई अपने शहर, अपने कमरे, अपनी किताबों के बीच। पर कुछ था जो वहीं छूट गया था— या शायद वहीं मिल गया था।


कुछ लोग ज़िंदगी में आने के लिए नहीं होते, वे बस यह याद दिलाने आते हैं कि हम आज भी महसूस कर सकते हैं।


यह मुलाक़ात भी कुछ ऐसी ही थी— अधूरी, ख़ामोश, पर पूरी तरह सच 

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