डायरी का वो पन्ना
मैं तुम्हें कभी ठीक-ठीक बता नहीं पाऊँगी
कि मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ।
शायद इसलिए नहीं कि कहना नहीं आता,
बल्कि इसलिए कि
ये प्यार शब्दों से बड़ा हो चुका है।
कभी-कभी तो मुझे खुद भी नहीं पता चलता
कि ये एहसास कब मेरी आदत बन गया—
सुबह की पहली सोच में,
शाम की थकान में,
और रात की ख़ामोशी में
तुम चुपचाप शामिल हो गए।
मैं कहीं भी जाती हूँ,
किसी नई जगह, किसी नए शहर में,
तो तुम्हें ढूँढ लेती हूँ
अपने आस-पास,
किसी अनजान चेहरे में,
किसी जानी-पहचानी मुस्कान में,
कभी हवा के स्पर्श में,
तो कभी किसी अधूरे गीत में।
न जाने क्यों,
तुम्हें महसूस करके
मेरे भीतर एक सुकून उतर आता है,
जैसे सब ठीक हो जाएगा…
जैसे मैं अकेली नहीं हूँ।
और फिर ये ख़याल आता है—
अगर न मिलने पर इतनी शिद्दत है,
अगर दूर रहकर भी
दिल इतना बेचैन है,
तो सोचो…
हम मिल जाएँ तो क्या होगा?
शायद मैं कुछ कह न पाऊँ,
शायद बस चुपचाप तुम्हें देखती रहूँ,
या शायद
सारी ज़िंदगी की अधूरी बातें
एक ही पल में कह दूँ।
बस इसी सोच से
मैं खुद ही मुस्कुरा देती हूँ,
और थोड़ी देर के लिए
दुनिया आसान लगने लगती है।
मुझे नहीं पता
कि मुझे तुमसे मोहब्बत क्यों है,
न ही ये पता है
कि ये कब शुरू हुई।
बस इतना जानती हूँ—
ये किसी वजह की मोहताज नहीं।
प्यार हो गया है, यार…
बिना पूछे, बिना सोचे,
बिना किसी शर्त के।
और हैरानी की बात ये है
कि ये प्यार
बिना किसी उम्मीद के
हर रोज़ और बढ़ जाता है।
मैं रोज़ खुद को
तुमसे मोहब्बत करने की
कोई न कोई वजह दे देती हूँ,
और फिर खुद ही मान भी जाती हूँ।
पर कभी-कभी
दिल सवाल भी करता है—
अगर तुम भी मुझे
इतनी ही शिद्दत से चाहते,
तो शायद
ज़्यादा कुछ नहीं,
बस एक मुलाक़ात ही काफ़ी होती।
पर फिर मैं खुद को समझा देती हूँ—
कि हर चीज़ का एक वक़्त होता है,
हर मिलन की एक घड़ी होती है।
जो अभी नहीं हुआ,
वो शायद
तैयारी में है।
तो ठीक है…
जब होनी होगी,
तब हो जाएगी मुलाक़ात।
तब तक
मैं तुम्हें
अपने एहसासों में,
अपनी दुआओं में,
और अपने इंतज़ार में
ज़िंदा रखूँगी।
हाँ,
तब तक मैं इंतज़ार में हूँ।
डायरी — अगला पन्ना
आज मन कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश है।
शोर नहीं है,
पर सुकून भी नहीं।
आज मैंने तुम्हें ढूँढने की कोशिश नहीं की,
फिर भी तुम
हर तरफ़ मिलते रहे।
कभी किसी याद में,
कभी किसी अधूरे ख़याल में,
और कभी
बस यूँ ही
दिल की धड़कन में।
आज पहली बार
मैंने खुद से ये माना
कि इंतज़ार आसान नहीं होता।
लिखने में जितना सादा लगता है,
जीने में उतना ही भारी।
कभी-कभी लगता है
कि मैं तुम्हें बहुत ज़्यादा महसूस करती हूँ।
इतना कि
खुद को पीछे छोड़ देती हूँ।
फिर डर लगता है—
कहीं ये मोहब्बत
मुझे मुझसे ही दूर न कर दे।
पर अगले ही पल
दिल मना कर देता है।
कहता है—
अगर ये प्यार है,
तो ये मुझे तोड़ेगा नहीं,
बस थोड़ा और
सच्चा बना देगा।
आज ये भी सोचा
कि अगर तुम कभी सामने आ गए,
तो मैं क्या कहूँगी?
शिकायत?
सवाल?
या बस एक लंबी सी ख़ामोशी?
शायद कुछ भी नहीं।
शायद बस
तुम्हें देखकर
ये यक़ीन कर लूँगी
कि जो मैंने महसूस किया,
वो वहम नहीं था।
आज ये भी समझ आया
कि हर प्यार
पाने के लिए नहीं होता।
कुछ प्यार
बस रहने के लिए होते हैं—
दिल में,
यादों में,
और उन पलों में
जो कभी हुए ही नहीं।
मैं अब रोज़
किसी नतीजे की उम्मीद नहीं करती।
बस दिन बीतने देती हूँ,
और एहसासों को
जैसा हैं,
वैसा ही रहने देती हूँ।
अगर तुम आओगे,
तो दिल खुलेगा।
अगर नहीं भी आए,
तो भी
ये मोहब्बत
ख़ुद में मुकम्मल रहेगी।
आज खुद से ये वादा किया है—
मैं इंतज़ार करूँगी,
पर खुद को भूलकर नहीं।
मैं चाहूँगी,
पर खुद को खोकर नहीं।
और हाँ…
अगर कभी ये इंतज़ार
बहुत भारी लगने लगे,
तो मैं
डायरी खोलूँगी
और तुम्हें
इन पन्नों में
थोड़ा और जी लूँगी।
आज के लिए
बस इतना ही।
— मैं 🌙
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