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यार, मैं ठीक महसूस नहीं कर रही हूँ।

कई दिनों से मन बहुत भारी है।

अब सोचती हूँ, अगर इस साल के साथ खुद को नहीं बदला,

तो शायद खुद को संभाल नहीं पाऊँगी — बिल्कुल अकेले।

और सच कहूँ तो कोई है भी नहीं

जो चुपचाप मेरा हाथ पकड़ कर कह दे

कि “मैं हूँ, डर मत।”


अब तो मुझे खुद नहीं पता कि मेरी चाहत क्या है।

कभी लगता है मुझे प्रेम चाहिए,

कभी लगता है बस थोड़ा सा अपनापन।

न मैं प्रेम करना बंद कर पा रही हूँ,

न तुमसे शिकायत कर पा रही हूँ,

क्योंकि शिकायत करने का हक़

शायद उसी को होता है

जिसे परवाह हो।


खुद को संभालने की कोशिश करती हूँ,

पर हर बार बिखर जाती हूँ।

न रो ठीक से पाती हूँ,

न मजबूत बन पाती हूँ।

और फिर भी, तुम्हें याद करना

बंद नहीं कर पाती।


जब तुम्हें कुछ कहने का ख्याल आता है,

तो सोचती हूँ लाड़ूँ तुमसे,

अपने सारे डर, सारी थकान

तुम्हारी गोद में रख दूँ।

फिर खुद को रोक लेती हूँ।

क्योंकि अगर तुम मोहब्बत करते,

तो मुझे यह सब सोचना ही नहीं पड़ता,

मुझे यूँ खुद को समझाना नहीं पड़ता।


अब बस ऐसा लगता है

कि हमारे बीच कुछ भी नहीं है।

ना वो अपनापन,

ना वो फिक्र,

जो कभी मुझे जिंदा-सा महसूस कराती थी।

जो भी है, सब एकतरफ़ा है — शायद।

या शायद मैं ही ज़्यादा महसूस कर रही हूँ।


मुझे अब कुछ साफ़ नहीं दिखता।

न रास्ता, न मंज़िल, न खुद मैं।

बस इतना पता है

कि अब मुझसे नहीं हो रहा।


या तो मुझे संभाल लो,

या मुझे खुद से अलग होने दो।

क्योंकि इस हालत में

मैं न पूरी तरह तुम्हारी हूँ,

न पूरी तरह अपनी।


मिस यू।

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 आज खुद से भागने का मन नहीं है,

आज बस खुद को देखना चाहती हूँ —

जैसी हूँ, टूटी हुई, उलझी हुई,

और बहुत ज़्यादा थकी हुई।


मैं हर रोज़ खुद को समझाती हूँ

कि मज़बूत बनना है,

कि किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।

पर सच ये है

कि हर किसी को कभी न कभी

किसी के कंधे की ज़रूरत होती है।

और आज मुझे भी है।


मैंने खुद को इतना समेट लिया है

कि अब साँस लेने में भी डर लगता है।

डर इस बात का नहीं कि तुम दूर हो,

डर इस बात का है

कि मैं कहीं खुद से भी दूर न हो जाऊँ।


कभी-कभी सोचती हूँ,

क्या मैं ज़्यादा चाहती हूँ?

या बस वही चाह रही हूँ

जो प्रेम में मिलना चाहिए —

थोड़ी सी परवाह,

थोड़ा सा ठहराव,

और ये एहसास कि मैं अकेली नहीं हूँ।


मैं शिकायत नहीं करना चाहती,

क्योंकि शिकायतें रिश्तों को भारी कर देती हैं।

पर चुप रहना भी अब

खुद से बेईमानी लगने लगा है।

इस चुप्पी में

मैं हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा

खुद को खो रही हूँ।


अगर तुम कभी पूछो

कि मुझे क्या चाहिए,

तो शायद मैं साफ़ जवाब न दे पाऊँ।

बस इतना कह पाऊँगी

कि मुझे समझा जाना है,

बिना समझाए…

और थामा जाना है,

बिना माँगे।


आज भी तुम्हारी याद आई,

पर इस बार आँसू नहीं आए।

बस एक खालीपन था,

जो बहुत शोर कर रहा था।


शायद यही मोड़ है

जहाँ मुझे चुनना होगा —

खुद को,

या उस उम्मीद को

जो हर दिन थोड़ा और कमजोर हो रही है।


आज इतना ही।

कल शायद

मैं खुद से थोड़ी और बात कर पाऊँ।


— तुम्हारी खरगोश 

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