एक पत्र

प्रिय अंकेश 🐒


आज मैं तुम्हें यह पत्र इसलिए लिख रही हूँ

क्योंकि बोल पाना अब आसान नहीं रहा।

शब्द भीतर तो हैं,

पर किसी के सामने

ठहर नहीं पाते।


मैं ठीक नहीं हूँ।

यह लिखते हुए भी

मुझे नहीं पता

कि ठीक न होने की असली वजह क्या है।

आज अनायास ही रो पड़ी—

न कोई बहस,

न कोई यादों की तैयारी।

बस अचानक।


शायद तुम्हें सोच रही थी,

या शायद अपनी किस्मत से थक गई थी।

अब फर्क करना भी मुश्किल हो गया है।


मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पा रही हूँ।

लोग हैं मेरे आसपास,

दोस्त हैं, बातें हैं,

पर भीतर कहीं

एक ऐसा सन्नाटा है

जो किसी आवाज़ से भरता नहीं।


आज रसोई में बर्तन धोते हुए

अचानक आँखें भर आईं।

पानी बह रहा था

और आँसू भी।

किसी ने देखा नहीं,

पर मैंने खुद को

पहली बार सच में टूटते देखा।


तुमसे मिलने से पहले

जो मैं थी,

वो कहीं खो गई है।

वो जो खुद पर भरोसा करती थी,

जो हल्की-सी बात पर भी

जीवन से जुड़ जाती थी।


अगर मुमकिन हो

तो उसे ढूँढकर मुझे लौटा दो।

मुझे तुम्हारा साथ नहीं चाहिए—

मैं जानती हूँ

तुम अब साथ नहीं दे सकते।

बस मेरी वही पहचान

मुझे वापस दे दो

जो तुम्हारे जाते ही

कहीं पीछे छूट गई।


मैं तुम्हें असहज नहीं करना चाहती।

न कोई शिकायत है,

न कोई आरोप।

बस यह सच है

कि मैं ठीक नहीं हूँ।


सोच रही हूँ

किसी मनोचिकित्सक से मिलूँ।

क्योंकि अब

अपनी बातें किसी अपने से भी

कह नहीं पा रही हूँ।

शायद किसी अजनबी के सामने

दिल थोड़ा हल्का हो जाए।


कभी-कभी सोचती हूँ

कि तुम्हें फर्क पड़ा होगा।

अगर हमारी बातें सच थीं,

तो उनका असर भी

सच ही होना चाहिए।

और अगर वो सब झूठ था,

तो शायद तुम बहुत आगे बढ़ चुके हो।


शायद तुम्हें कोई मिल भी गई हो—

जिससे तुम बातें बाँट सको,

जिसके साथ

दिन थोड़ा आसान लगे।


और मैं…

मैं अब भी वहीं हूँ,

उसी जगह

जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।

आगे क्या करना है

यह नहीं जानती।

बस इतना जानती हूँ

कि मैं थक गई हूँ

खुद को संभालते-संभालते।


फिर भी,

इस थकान के बीच

एक छोटी-सी उम्मीद अब भी है—

कि एक दिन

मैं खुद को फिर से पा लूँगी।

तब यह पत्र

किसी दर्द की नहीं,

एक बीते हुए दौर की याद बन जाएगा।


तब तक,

बस इतना ही।


— तुम्हारी

खरगोश 🐇

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